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ځینې ښځینه فعالانې: د طالبانو فرمانونو ښځې څنډې ته کړي

طالبانو په افغانستان کې د خپلې واکمنۍ په نږدې یو نیم کال کې پر ښځو د محدودیتونو لګولو په برخه کې ډېر شمېر فرمانونه صادر کړي چې په ټولیز باور دې فرمانونو ښځې څنډې ته کړي دي.


طالبانو په افغانستان کې د خپل بیاځلي واکمنېدو په تېرو نېږدې اتلسو میاشتو کې داسې فرمانونه صادر کړي چې له امله یې د ښځو ټولنیز فعالیتونه ځنډول شوي یا بیخي په ټپه درېدلي دي.


طالبانو تر دې دمه شاوخوا پنځلس داسې سپارښتنې او فرمانونه صادر کړي چې ښځې یې له خپلو بنسټیزو حقونو بې برخې کړې دي.


ځینې داسې فرمانونه هم شته چې د ښځو د نوم د نه ذکر کولو له امله د افغان ښځو حقونه تر پښو لاندې شوي او یا له پامه غورځول شوي دي.


له شپږم ټولګي څخه پورته او په پوهنتونونو کې د زده کړو بندېدل، له کار څخه او له عامه ځایونو او سیاسي فعالیتونو څخه د ښځو منع کول په افغانستان کې پر ښځو تر ټولو مهم بندیزونه دي.




همدارنګه پر نجونو او ښځو د حجاب اجباري کول، تفریحي ځایونو او حمامونو ته په تګ یې بندیز، په ورزشي ټیمونو کې ګډون یا لوبغالو ته تلل او له شرعي محرم پرته لرې واټڼ سفر کول هغه مسایل دي چې د طالبانو په فرمانونو کې منع شوي دي.


د ۲۰۲۲ کال د ډسمبر په ۲۰ مه، په پوهنتونونو کې پر زده کړو بندیز او د یاد کال د ډسمبر په ۲۴ مه په نادولتي ادارو کې پر کار کولو بندیز د ښځو په اړه د طالبانو له وروستیو جدي فرمانونو څخه دي.


ډېری داسې نجونې او ښځې شته چې وايي، دغه بندیزونو دوی له خپګان او رواني ستونزو سره مخ کړې دي.


د بدخشان پوهنتون یوه زده کوونکې، شهره تمنا وایي چې د پوهنتونونو د بندېدو خبر په اورېدو یې شوک لیدلی و.


تمنا وویل: "کله چې له دې موضوع خبره شوم ، شوک مې وليد. ډېر بد حالت مې درلوده، ان څو ورځې له هغه حالته نه شوم راوتلې، رواني حالت مې ډېر خراب و او تل مې په دې فکر کاوه چې پوهنتونونه بند شول او زمونږ هيلې نيمګړې پاتې شوې."


فرشته عظيمي چې زده کوونکې وه، ازادي راډيو ته یې وويل چې د طالبانو لخوا له شپږم ټولګي څخه پورته نجونې د زده کړو څخه منع کول، جنسيتي تبعيض ښيي.


عظیمي وویل:  "يو هلک چې له تا يې لږ درس ويلی وي، ستا نه لږه علاقه ولري، هغه کولای شي چې ولاړ شي او زده کړې وکړي، خو ته يې نه شې کولای، کله چې پوښتو ولې؟ وايي ته نجلۍ يې، کرار کرار يې ټولې دروازې پر مونږ بندې کړې او دا په بشپړ توګه د ښځو حذفول دي."


سکینه حسیني وایي چې د کور یواځینۍ ډوډۍ ګټونکې ده او په یوه نادولتي اداره کې یې کار کاوه، خو د طالبانو د ورستي فرمان له امله یې خپله دنده له لاسه ورکړه.


حسیني وویل: "شخصاً زه د خپل اقتصادي حالت او راتلونکې په اړه اندېښمنه يم، ځکه زه د اته کسيزې کورنۍ يوازينۍ کفيله يم. په اوسنيو شرايطو کې يوازې بهرنيو او نادولتي موسسو د ښځو لپاره کاري فرصتونه درلودل، که په دغو موسساتو کې ښځو ته د کار اجازه ورنه کړي، زه هېڅ بل عايد نه لرم."


د افغانستان د بشر د حقونو د خپلواک کمېسیون پخوانۍ رییسه او د رواداري به نوم د یوې موسسې اجرایوي رییسه شهرزاد اکبر وايي چې طالبانو د دې فرمانونو په صادرولو سره د ښځو د وړتیاوو د ځپلو هڅه کړې ده.


مېرمن اکبر له ازادي راډیو سره په خبرو کې د طالبانو فرمانونه ظالمانه وبلل او ویې ویل، چې دا د ښځو د ژوندۍ ښخولو په مانا دي.




اکبر وویل: "له بده مرغه، طالبانو تر اوسه د ټولنې د نیمايي وګړو هیلې له پامه غورځولي، فضا یې محدوده کړې او د میلیونونو افغان نجونو وړتیا یې تر پښو لاندې کړې چې کولای شي ساینسپوهانې، فضانوردانې، انجینرانې او یا ډاکټرانې شي."


د بشري حقونو فعاله منیژه رمزي وايي، د ښځو په اړه د طالبانو فرمانونه په لنډ مهالي او اوږد مهال کې ناوړه پایلې لري.


مېرمن رمزي د افغان ښځو غږ پورته کول د بشري حقونو فعالانو، مدني ټولنو او رسنیو دنده ګڼي.


هغه زیاتوي: " اکثريت هغه ښځې او نجونې چې د فرمانونو له امله په کورونو ناستې دي، له رواني ستونزو سره مخ دي. دغو فرمانونه د افغانستان ښځو په ټولنيز ژوند کې ناوړه او منفي پایلې لري او په اوږد مهال کې به مونږ له دې نه د بدترو عواقبو شاهدان اوسو. د ښځو د حقونو په برخه کې فعالان، مدني ټولنې او رسنۍ په داسې شرایطو کې لوی مسوولیت لري چې د افغان ښځو برحقه غږ پورته کړي."


دا په داسې حال کې ده چې د طالبانو حکومت تل ټینګار کړی چې په افغانستان کې د ښځو حقونه د اسلامي شریعت په چوکاټ کې خوندي دي، د زده کړو، تحصیل او کار محدودیتونه لنډمهاله دي او هڅه کوي چې په دې اړه اندېښنو ته قناعت ورکوونکی ځواب ورکړي.


د طالبانو لخوا دغه محدودیتونه له پراخو کورنیو او بهرنیو غبرګونونو سره مخ شول.


ان تر دې چې د ملګرو ملتونو سازمان دوه جلا جلا پلاوي کابل ته واستول چې طالبان په نادولتي ادارو کې د ښځو په کار کولو او لوړ رده کړو خپل د بندیز فرمانونه بېرته واخلي.


خو طالبانو تر اوسه د ښځو د حقونو، تعلیم، کار او په ټولنه کې د فعال حضور په برخه کې د ښځو او نړیوالې ټولنې غوښتنو ته پام نه دی کړی او د افغان ښځو په وینا، د هرې ورځې په تېرېدو د دوی پر حقونو او آزادیو نوي بندیزونه لګول کېږي.


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