कलाशनिकफ़ के भारत में उत्पादन से सुरक्षा बलों में राइफ़ल की कमी दूर होगी
भारतीय सेना अभी तक 5.56 मिलीमीटर मोटी नली वाली ’इन्सास’ (भारतीय लघु शस्त्र प्रणाली) राइफ़ल के साथ प्रयोग करती रही है। ’इन्सास’ राइफ़लों में हमेशा कोई न कोई दिक़्क़त बनी रहती है, इसलिए भारतीय सेना ने तय किया कि वह 7.62 मिलीमीटर की नली वाली एक बिल्कुल नई राइफ़ल अपनाएगी। भारतीय सेना की सभी डिवीजनों को उच्च कोटि के हथियारों और उन्नत शस्त्रों से लैस करने का व्यापक अभियान शुरू होने जा रहा है, जिसके अन्तर्गत दस लाख से भी अधिक सैनिकों को नए हथियार दिए जाएँगे। कहा जा रहा है कि पिछले कई विफल प्रयासों के विपरीत इस बार यह अभियान बिल्कुल सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।
किन्तु एक नई राइफ़ल विकसित करने की कोशिश का शायद ही कोई फ़ायदा होगा। मिख़ाइल कलाशनिकफ़ ने 1947 में ही एके-47 राइफ़ल के रूप में इतना उन्नत हथियार बना दिया है कि छोटे हथियारों के आधुनिक निर्माताओं के लिए उससे बेहतर हथियार बना पाना असम्भव नहीं, तो बेहद मुश्किल ज़रूर है। भारतीय सेना इस समय 7.62 मिलीमीटर मोटी नाल वाली राइफ़ल अपनाना चाहती है और संयोगवश कलाशनिकफ़ राइफ़ल की नाल भी इतनी ही मोटी है। इससे कलाशनिकफ़ राइफ़ल के दुनिया भर में सबसे विश्वसनीय हथियार माने जाने का बात पुख़्ता होती है। उल्लेखनीय है कि कलाशनिकफ़ आज के ज़माने का वह हथियार है, जिसकी नक़ल करने की सबसे ज़्यादा कोशिशें की गईं।
भारत में कलाशनिकोव रायफ़लों का उत्पादन शुरू होगा
वास्तव में, पिछली सदी के नौवें दशक तक भारत के सैनिक 7.62 मिलीमीटर मोटी नाल वाली स्वदेशी सेल्फ़ लोडिड राइफल यानी एसएलआर से कुल मिलाकर सन्तुष्ट ही थे। हालत तब ख़राब हुई, जब रक्षा अनुसन्धान व विकास संगठन ने ठीक-ठाक काम करने वाली इस उत्तम राइफ़ल को बेहतर बनाने की बजाय एक बिल्कुल नई राइफ़ल बनाने का प्रस्ताव रख दिया। एक ओर जहाँ भारतीय सेना जब-तब कभी पूरी न की जा सकने वाली नई-नई मांगें सामने रखती है, तो वहीं दूसरी ओर रक्षा अनुसन्धान व विकास संगठन ज़रूरी विशेषज्ञों के बिना ही अधुनातन हथियार विकसित करने की कोशिश में लगा रहा। इस सब का मिला-जुला असर यह हुआ कि ’इन्सास’ (भारतीय लघु शस्त्र प्रणाली) परियोजना को ही ग्रहण लग गया।
सैन्य इतिहासकार टिमोथी डी० हॉयट ने अपनी पुस्तक ‘सैन्य उद्योग तथा क्षेत्रीय रक्षा नीति – भारत, इराक और इजराइल’ में समझाया है — पिछली सदी के नौवें दशक के शुरूआती सालों में रक्षा अनुसन्धान व विकास संगठन ने सेना के लिए 5.56 मिलीमीटर मोटी नाल वाले छोटे हथियारों की एक नई सीरीज विकसित करने की परियोजना बनाई थी। इस परियोजना को ’भारतीय लघु शस्त्र प्रणाली’ यानी ’इन्सास’ कहा गया था। जर्मनी की ‘हेक्लर व कोख’ और आस्ट्रिया की ‘स्टायर’ कम्पनियों ने भारत की इस तात्कालिक ज़रूरत को पूरा करने और 45 लाख अमरीकी डालर मूल्य की प्रौद्योगिकी को मुफ़्त हस्तान्तरित करने का प्रस्ताव रखा था।
इन प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया गया और रक्षा अनुसन्धान व विकास संगठन अगले दस सालों तक लगभग 2 अरब रुपए की धनराशि खर्च करके छोटे हथियारों की नई सीरीज बनाने की कोशिश करता रहा। मज़े की बात यह है कि स्टायर और हेक्लर व कोख की तकनीक के आधार पर ही इन हथियारों को विकसित करने की कोशिश की गई। इस बीच भारत अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए पूर्व वारसा सन्धि के सदस्य देशों से एके-47 राइफ़लों का आयात करता रहा। भारतीय सेना को ’इन्सास’ सीरीज की ये राइफ़लें आख़िरकार पिछली सदी के आख़िरी दशक के अन्तिम वर्षों में ही मिल सकीं।
उत्तम राइफ़ल न बन पाने के कारण
हालाँकि ’इन्सास’ राइफ़ल का निशाना एके-47 की तुलना में कहीं अधिक सटीक है, लेकिन विश्वसनीय न होने के कारण यह राइफ़ल पिट गई। भारतीय सैनिकों को तो समझिए, इससे नफ़रत-सी हो गई। कारगिल युद्ध के दौरान ’इन्सास’ राइफ़लें बार-बार जाम हो जाती थीं। इस वजह से भारत को उस समय हज़ारों-लाखों की संख्या में एके-47 राइफ़लों का आपातकालीन आयात करना पड़ा। ’इन्सास’ राइफ़लों का निर्माण भारतीय आयुध बोर्ड के कारख़ानों में किया जाता है। भारतीय आयुध बोर्ड के कारख़ानों में घटिया हथियारों का उत्पादन होने का प्रमुख कारण यह है कि इन कारख़ानों को हथियार बनाने वाले पेशेवर विशेषज्ञ नहीं, बल्कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के नौकरशाह संचालित करते हैं। हथियार बनाने की प्रक्रिया में रणक्षेत्र का अनुभव रखने वाले, विशेषकर नगरीय युद्धकला के क्षेत्र में अनुभवी सैनिकों तथा अधिकारियों की न तो कोई भागीदारी होती है, और न ही उनकी राय ली जाती है।
भारत रूसी रक्षा तकनीक का पूरी तरह से अपने यहाँ उत्पादन करने में विफल क्यों?
सेना के पास निश्चित रूप से अभिनव प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। भले ही सेना अपनी नौकरशाही से जूझ रही हो, लेकिन एक सैनिक ने ’इन्सास’ राइफ़ल में बदलाव किया, जिससे ’इन्सास’ राइफ़ल की लम्बाई और वज़न कम हो गया और उससे कोने में बैठकर निशाना लगाना सम्भव हो गया। भारतीय टेलीविजन चैनल एनडीटीवी को एक सूत्र ने बताया — यह संशोधित ’इन्सास’ राइफ़ल अब आकार में छोटी है, जिसे पकड़ना आसान है और यह रायफ़ल गोलीबारी के दौरान अधिक स्थिर निशाना लगाती है। इसलिए निशाना अब पहले की तुलना में अधिक सटीक होता है।
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी तो इससे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उस सैनिक को ’अभिनव खोज प्रमाणपत्र’ भी प्रदान किया। उल्लेखनीय है कि उस सैनिक की पहचान गुप्त रखी गई है। दुख की बात है कि इस सैनिक जैसे अभिनव आविष्कारक गुमनाम रह जाते हैं और रक्षा उद्योग में ऐसे लोगों की प्रतिभा का सदुपयोग किए जाने की कोई सम्भावना नहीं दिखती। भारत को सैन्य तकनीक बनाने वाले डिजाइनरों के महत्व को समझना चाहिए। उदाहरण के लिए, मिख़ाइल कलाशनिकफ़ ने दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी के उन्नत कोटि के छोटे हथियारों की तुलना में रूसी राइफ़ल की कमियों की अपनी जानकारी के आधार पर ही एके-47 राइफ़ल का विकास किया था।
लाइसेंशुदा उत्पादन
हमलावर राइफ़ल का निर्माण ख़ुद भारत द्वारा किया जाए, यह बड़ा ही उत्तम विचार है। किन्तु पिछले चार दशकों में भारत ने ऐसी कोई क्षमता प्रदर्शित नहीं की है। जब तक रक्षा मन्त्रालय की ओर से भारतीय आयुध बोर्ड को थोड़ा पेशेवर नहीं बनाया जाता, तब तक कलाशनिकफ़ राइफ़ल जैसी रायफ़ल बनाने की कोशिश करने से भारत को कोई फ़ायदा नहीं होगा। दूसरी ओर, भारत में पिछली सदी के सातवें दशक से ही हथियारों का लाइसेंसशुदा उत्पादन सफलतापूर्वक किया जा रहा है।
टिमोथी डी० हॉयट के अनुसार – लाइसेंसशुदा उत्पादन से अधिकांश सैन्य ज़रूरतों को पूरा करना सम्भव होता है, हथियारों के सप्लायर देशों की मनमानी पर लगाम लगती है और भारत की सैन्य व औद्योगिक क्षमता भी विश्व के सामने आती है। पराध्वनिक यानी सुपरसोनिक विमानों या विशाल युद्धपोतों अथवा उन्नत डीजल हमलावर पनडुब्बियों के निर्माण की क्षमता दुनिया के सिर्फ़ कुछ ही देशों के पास है। इस तरह भारत की औद्योगिक क्षमता भारत को एक विकासशील ताक़त और महान देश के रूप में सामने लाती है।
नई रूसी स्नाइपर रायफ़ल कैसी है?
जब तक भारत के पास एक विश्वस्तरीय राइफ़ल विकसित करने की क्षमता नहीं आ जाती, तब तक रक्षा मन्त्रालय को लाइसेंसशुदा उत्पादन करके सेना की ज़रूरतों को पूरा करना चाहिए।
छोटे हथियारों का विकास और रूस
भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठान बहुत विशाल हैं, इसलिए भारत को विदेशी सहयोगियों की कोई कमी नहीं रहेगी। उल्लेखनीय है कि भारत की सेना में दस लाख से अधिक सैनिक हैं। इसके अलावा उसके अर्धसैनिक बलों में भी लाखों जवान हैं। जब रूस ने भारत को पनडुब्बियों और सुखोई लड़ाकू विमानों का उत्पादन करने की अनुमति दे रखी है, तो उसे कलाशनिकफ़ राइफ़ल के उत्पादन को लेकर भी कोई दिक़्क़त नहीं होगी। राइफ़ल उत्पादन के मामले में रूस की तकनीक पश्चिमी देशों से कहीं ज़्यादा उन्नत है। चेचन्या जैसे इलाकों में विद्रोहियों के खिलाफ़ चलाए गए छोटे अभियानों से भी रूस को जो जानकारी और सीख मिली, उसके आधार पर रूस ने छोटे हथियारों की एक पूरी शृंखला का बिल्कुल नए सिरे से विकास किया है। इन हथियारों के निर्माण व विकास कार्य को लेकर रूसी सेना के विभिन्न विभागों के बीच व्यापक समन्वय देखने को मिलता है।
अमरीकी गुप्तचर एजेन्सी सीआईए द्वारा सार्वजनिक की गई एक रिपोर्ट में रूस, अमरीका, ब्रिटेन, फ़्राँस तथा तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी की सेनाओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले छोटे हथियारों की सीरीज की तुलना की गई है। इस रिपोर्ट में सीआईए ने यह निष्कर्ष निकाला है कि रूसी हथियार साफ़ तौर पर नाटो के हथियारों से बेहतर हैं। एक ओर जहाँ स्वचालित गोलीबारी करने के मामले में पश्चिमी देशों के हथियारों का प्रदर्शन काफी खराब रहा, वहीं दूसरी ओर रूसी हथियार तुलनात्मक रूप से उनसे कम वजनी होने के बावजूद काम और विश्वसनीयता के पैमाने पर कहीं बेहतर हैं।
यह रिपोर्ट सीआईए की ’सैन्य विचार’ पत्रिका में प्रकाशित हुई है। 7.62 मिलीमीटर मोटी नाल वाली राइफ़ल के बारे में भारत की सेना के जिन उच्चाधिकारियों को फ़ैसला करना है, उन्हें यह रिपोर्ट जरूर पढ़नी चाहिए। इस अमरीकी रिपोर्ट में कहा गया है – रूसी रायफ़लों के कारतूस डेढ़ हज़ार मीटर तक की दूरी पर मौज़ूद सैनिकों को भी धूल चटा देंगे और 600 से लेकर 900 मीटर तक की दूरी पर मौजूद सैनिकों के हेलमेट या बुलेटप्रूफ़ जैकेट को भी पूरी विश्वसनीयता से भेद देंगे।
न्यूज़ीलैण्ड में रहने वाले राकेश कृष्णन सिंह पत्रकार व विदेशी मामलों के विश्लेषक हैं।
इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।
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