राष्ट्रपति ट्रम्प से किसी चमत्कार की आशा नहीं
जहाँ तक भारत और रूस का सवाल है, तो ट्रम्प इन दोनों देशों के लिए अमरीका के सर्वोत्तम राष्ट्रपति साबित हो सकते हैं। चुनाव-प्रचार के दौरान जब डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि हम हिन्दुओं से प्यार करते हैं, हम भारत से प्यार करते हैं, तो अनेक भारतीय ख़ुशी और उत्साह से झूमने लगे थे।
डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा था — मैं आपको इस बात का विश्वास दिलाता हूँ कि भारतीय और हिन्दू समुदाय को मेरे रूप में एक सच्चा हितैषी मिलेगा। राष्ट्रपति के रूप में मैं भारत के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलूँगा और उसके साथ गुप्तचर सूचनाओं का आदान-प्रदान करूँगा ताकि हम दोनों देशों के लोग सुरक्षित रह सकें।
उन्होंने आगे कहा था — मेरी सरकार भारत के साथ और गहरा सहयोग करेगी। वास्तव में, मैं भारत और अमरीका के रिश्तों को 'सदाबहार' से भी आगे यानी सर्वोत्तम की श्रेणी में ले जाऊँगा.... मैं प्रधानमन्त्री मोदी के साथ काम करने का इच्छुक हूँ, जो भारत की नौकरशाही व्यवस्था को सुधारने के लिए तत्पर हैं।
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जहाँ तक भारतीयों का सवाल है, तो अपने चुनाव-प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रम्प ने उनकी बिल्कुल सही नस पर हाथ रख दिया था। उन्होंने कहा —पाकिस्तान दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश है क्योंकि उसके पास परमाणु हथियार हैं।
डोनाल्ड ट्रम्प का मानना है कि पाकिस्तान का हाल वैसे तो उत्तरी कोरिया जैसा नहीं है और पाकिस्तानियों में थोड़ी-बहुत समझ जरूर है लेकिन पाकिस्तान के दुष्टता पर उतर आने की भरपूर संभावना नज़र आ रही है। ट्रम्प पाकिस्तान के लिए यह समाधान सुझाते हैं — हमें इस काम में भारत को शामिल करना होगा। भारत ही पाकिस्तान पर नकेल लगाने का काम कर सकता है। भारत के पास भी परमाणु हथियार हैं। उसकी सेना भी बहुत शक्तिशाली है। भारत पाकिस्तान पर पूरी तरह से नकेल लगा सकता है।
जब ट्रम्प से पूछा गया कि क्या आप पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के मामले में उसी तरह पीछे पड़ेंगे, जिस तरह से ओसामा बिन लादेन के पीछे राष्ट्रपति बराक ओबामा पड़े थे, तो उन्होंने कहा— क्या आप चाहते हैं कि शत्रु हमारे अगले क़दम को भाँप जाए… मैं क्या करना चाहता हूँ, मैं इसकी घोषणा नहीं करना चाहता। इसका मतलब डोनाल्ड ट्रम्प यह मानते हैं कि यदि पाकिस्तान दुष्टता पर उतरता है, तो वह नहीं चाहते कि पाकिस्तान को उनके द्वारा सम्भावित रूप से उठाए जाने वाले क़दम की भनक भी लगे।
ट्रम्प ने 2012 में पाकिस्तान के लिए इससे भी अधिक कड़ी भाषा का प्रयोग किया था — पाकिस्तान हमारा मित्र नहीं है। पाकिस्तान सिर्फ़ अपने मतलब का साथी है। वहाँ के लोग पक्के बदमाश हैं और हमसे दुश्मनी की भावना रखते हैं।
दुनिया की भूसामरिक व्यवस्था में रूस और भारत की भूमिका महत्वपूर्ण
पाकिस्तान में घबराहट
डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के बाद पाकिस्तान के भीतर भारी चिन्ता का माहौल है। पाकिस्तान के प्रमुख पत्रकार नजम सेठी मानते हैं कि ट्रम्प का अमरीका का राष्ट्रपति बनना पाकिस्तान के लिए बड़ी मुसीबत साबित होगा। उन्होंने कहा — ट्रम्प पाकिस्तान के पक्ष में नहीं, बल्कि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ काम करेंगे। ट्रम्प रिपब्लिकन पार्टी के पुराने नेताओं की तरह नहीं हैं। ट्रम्प कह रहे हैं कि यदि आप अफ़ग़ानिस्तान में हमारा सहयोग नहीं करेंगे, तो हम आपका जीवन नरक बना देंगे।
अमरीका को चाहिए पिछलग्गू पाकिस्तान
हालाँकि अमरीकी राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी होना और वास्तव में राष्ट्रपति होने के बीच बड़ा फ़र्क है। चुनाव-प्रचार के दौरान भी ट्रम्प ने यह ऐलान किया था कि पाकिस्तान मुश्किलें पैदा करने वाला मुल्क है, लेकिन फिर भी वह अमरीका के लिए सचमुच एक ज़रूरी मुल्क है। अमरीका के लिए पाकिस्तान के इतने महत्वपूर्ण होने का कारण वास्तव में उसकी भौगोलिक स्थिति है।
पाकिस्तान ईरान तथा पश्चिम एशिया के बहुत नज़दीक है। इसके अलावा वह अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अमरीकी सैनिकों तक रसद और कुमुक की सप्लाई पहुँचाने के लिए सबसे सस्ता रास्ता भी उपलब्ध कराता है। अमरीका इस रास्ते पर बुरी तरह से निर्भर है, बल्कि कहना चाहिए कि अफ़ग़ानिस्तान के मामले में यह रास्ता उसके लिए जीवनरेखा की तरह काम करता है।
अमरीका द्वारा पाकिस्तान को एक किनारे न किए जाने के पीछे दूसरा ज़रूरी कारण यह है कि अमरीका के रक्षा विभाग, विदेश मन्त्रालय तथा अनगिनत विचारक समूहों में पुराने शीतयुद्ध की मानसिकता वाले कुछ ऐसे लोग जड़ जमाए बैठे हैं, जो पाकिस्तान के पक्षधर हैं। डोनाल्ड ट्रम्प इनसे मुक्ति पाने की चाहे जितनी भी कोशिश करें, वह उनसे मुक्त नहीं हो सकते क्योंकि उनकी तथाकथित सपनों की टीम में इन्हीं जगहों से लोग लिए जाएँगे। अमरीका के राजनेता व सेना के उच्चाधिकारी एक देश के रूप में पाकिस्तान को बिखरने नहीं देंगे क्योंकि उन्हें डर है कि पाकिस्तान के टूटने पर परमाणु संकट पैदा हो सकता है।
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इसका तीसरा कारण यह है कि अमरीकी अकादमिक जगत और अमरीका का उदारवादी सम्भ्रान्त वर्ग भारत को एक दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है। वे भारत में असाधारण तीव्र गति से हो रहे औद्योगिक विकास और अनगिनत डिजिटल स्टार्टअप कम्पनियों के उदय से भयभीत हैं, जो इस बात का संकेत है कि भारत में आख़िरकार बड़ी तेज़ गति से अभिनव उद्यम स्थापित हो रहे हैं। चूँकि भारत की 80 करोड़ जनसंख्या 35 साल से कम आयु की है, इसलिए आगामी दशकों में भारत निश्चित रूप से दुनिया की एक प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में उभरेगा। पिछले 50 सालों में भारी संख्या में भारतीय वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने पश्चिमी देशों का रुख किया, लेकिन अब प्रतिभा-पलायन की इस प्रकिया की दिशा उलटकर पश्चिमी देशों से भारत की ओर हो सकती है।
अमरीका के सैन्य उच्चाधिकारियों और राजनयिकों को भारत के उदय से अमरीकी प्रभुत्व के लिए बड़ा ख़तरा दिख रहा है। इसलिए उनकी नज़र में पाकिस्तान और भारत को लगातार आपसी झगड़ों में फँसाए रखना साफ़ तौर पर अमरीकी हितों के अनुकूल है। हमें इतिहास को नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान का निर्माण ब्रिटेन ने भविष्य में एक महाशक्ति के रूप में भारत के उदय को रोकने के लिए ही किया था। उल्लेखनीय है कि अमरीका से पहले ब्रिटेन दुनिया की प्रमुख साम्राज्यवादी व शोषक ताक़त था और ब्रिटेन अतीत में अमरीका का सलाहकार देश था तथा आज भी उसका सलाहकार व सहयोगी है।
खैर, भारत के घर-घर में ट्रम्प की चर्चा शुरू होने के काफ़ी पहले से ही भारत और अमरीका के रिश्ते लगातार मज़बूत हो रहे हैं। आज भारत किसी भी दूसरे देश की तुलना में अमरीका के साथ अधिक सैन्याभ्यास करता है। पिछले 10 सालों में भारत ने अमरीका से 14 अरब अमरीकी डालर के हथियार ख़रीदे हैं, जो उनके बीच लगातार मज़बूत होते सामरिक रिश्तों का संकेत हैं। अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प के जीतने के कारण हिलेरी क्लिण्टन अब दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध में तो नहीं झोंक सकेंगी, लेकिन चुनाव-प्रचार के दौरान ट्रम्प द्वारा किए गए ज़्यादातर वादे व्यावहारिक नहीं दिखते। अपने चुनाव-प्रचार के दौरान ट्रम्प ने कहा था कि वे रूस के साथ हमेशा के लिए मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाना चाहते हैं, भारत के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलना तथा अमरीका की मनमानी व बेतुकी लड़ाइयों को बन्द करना चाहते हैं और अमरीका को फिर से एक महान देश बनाना चाहते हैं।
यदि आप यह सोचते हैं कि ट्रम्प यह सब कुछ कर सकते हैं, तो आप सच्चाई से कोसों दूर हैं। यह बात लगभग निश्चित है कि ट्रम्प की टीम में विदेश सुरक्षा को लेकर सबसे बड़ी भूमिका जॉन बोल्टन की होने जा रही है। युद्ध-समर्थक और रूस-विरोधी जॉन बोल्टन ने इराक पर अमरीकी हमले में प्रमुख भूमिका निभाई थी। उनके स्वभाव का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी राय में परमाणु युद्ध को रोकने का एक ही तरीका है कि ख़ुद परमाणु युद्ध शुरू कर दिया जाए।
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हालाँकि हमें ट्रम्प की अच्छी भावनाओं की उपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए। यह बात साफ़ है कि अमरीका में सत्ता में चाहे जो आए-जाए, अमरीकी नीतियाँ कुल मिलाकर वही की वही बनी रहने वाली हैं।
रूसी जुआ
रूस और पूतिन से डोनाल्ड ट्रम्प का प्रेम अमरीका के नवरूढ़िवादियों के लिए किसी राजनीतिक भूचाल से कम नहीं है। 2016 के पूरे चुनावी अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रम्प को अपने रूस-समर्थक दृष्टिकोण के लिए अपनी ही पार्टी के लोगों की आलोचना का सामना करना पड़ा, किन्तु वह अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने कहा — मैं रूस के साथ अच्छे रिश्ते बनाऊँगा, मैं पूतिन के साथ अच्छे रिश्ते बनाऊँगा। मुझे उम्मीद है कि पूतिन भी मुझे निराश नहीं करेंगे और हमारे बीच हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि उत्तर अटलाण्टिक सन्धि संगठन अब प्रासंगिक नहीं रह गया है। उन्होंने घोषित किया कि रूसियों और सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को सीरियाई आतंकवादियों से कड़ाई से निपटना चाहिए। इस बात से अमरीका के सम्भ्रान्त वर्ग में इतनी भयंकर उथल-पुथल मच गई है कि वहाँ के दोनों दलों के लोग ट्रम्प की विदेश नीति की आलोचना कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि अमरीकी सत्ता प्रतिष्ठान की शान्ति में कोई रुचि नहीं है। जिस तरह कोई नशेड़ी लगातार अपने नशे के ही जुगाड़ में लगा रहता है, ठीक उसी तरह अमरीकी अर्थव्यस्था को भी अब लगातार कोई न कोई युद्ध चाहिए। अमरीकी अर्थव्यवस्था अब पूरी तरह से एक युद्ध-आधारित अर्थव्यवस्था बन चुकी है, जिसे अपने हथियार उत्पादक कारखानों को लगातार चलाते रहने के लिए नई-नई लड़ाइयाँ शुरू करने की ज़रूरत पड़ती है।
यही कारण है कि यदि दुनिया भर में चल रही अनगिनत लड़ाइयाँ बन्द हो जाएँगी, तो अमरीकी अर्थव्यवस्था बिल्कुल ठप्प हो जाएगी। यदि डोनाल्ड ट्रम्प पूतिन के साथ सीरिया तथा उक्रईना के मामलों को सुलझाने का प्रयास करते हैं और अमरीका व रूस व के बीच स्थाई शान्ति स्थापित करते हैं, तो रिपब्लिकन पार्टी के उनके साथी, मीडिया और डेमोक्रेटिक पार्टी के लोग एक साथ मिलकर उन पर धावा बोलेंगे।
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इसके अलावा, यदि उनके मन्त्रिमण्डल में उसी तरह के ‘युद्धपिपासु’ लोगों को जगह मिलती है, जिनके विरुद्ध वे पूरे चुनावी अभियान में आग उगलते रहे, तो फिर ट्रम्प सरकार भी अमरीका की वर्तमान सरकार से कोई अलग नहीं होगी। आख़िर ओबामा ने भी तो अपने चुनाव अभियान में युद्ध बन्द करने का ही वादा किया था, परन्तु चुने जाने के बाद उन्होंने लड़ाइयों को और भड़काने का ही काम किया।
उदाहरण के लिए, डोनाल्ड ट्रम्प के नज़रिए से बिल्कुल अलग जॉन बोल्टन दुनिया में हर जगह हस्तक्षेप करने का विचार रखते हैं। वे सीरिया में अमरीकी सहायता-प्राप्त विद्रोहियों और आतंकवादियों पर रूसी सेना के हमलों की आलोचना करते हैं — अमरीका को ऐसा कोई क़दम नहीं उठाना चाहिए, जिसका यह मतलब निकलता हो कि हम रूस के नए लताकिया वायुसैनिक अड्डे या इस अंचल के आकाश में रूसी लड़ाकू विमानों व क्रूज मिसाइलों की उपस्थिति को मान्यता दे रहे हैं। रूस के साथ युद्ध विरोधी समझौता करने का सुझाव सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है, लेकिन व्यवहार में यह एक बहुत ही ख़राब विचार है।
चूँकि डोनाल्ड ट्रम्प एक अत्यधिक सफल व्यवसायी हैं, इसलिए उनका वैश्विक दृष्टिकोण पेशेवर राजनेताओं के दृष्टिकोण की तुलना में बहुत अधिक व्यापक है। बहुत-से दूसरे लोगों से बिल्कुल उलट वे किसी अन्य व्यक्ति की कृपा के कारण सफल नहीं हुए हैं। वे निवर्तमान राष्ट्रपति ओबामा की तुलना में अधिक स्वतन्त्र हैं, किन्तु अमरीका की विदेश नीति को अपनी मनमर्जी से चलाने की उनकी क्षमता भी अत्यधिक सीमित है क्योंकि अमरीका में सरकार के बदलने का मतलब यह नहीं है कि उनकी विदेश नीति में भी अनिवार्य रूप से बदलाव होगा।
रूस तथा भारत के प्रति ट्रम्प का प्रस्ताव और नरेन्द्र मोदी व व्लदीमिर पूतिन के प्रति उनका सराहना का भाव वास्तविक हो सकता है, लेकिन देशों की व्यवस्था व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द पर नहीं, बल्कि देश के संकीर्ण हितों के आधार पर काम करती है।
डोनाल्ड ट्रम्प – और भारतीयों तथा रूसियों को भी – जल्दी ही इस बात का पता चल जाएगा।
यह जरूरी नहीं है कि लेखक की राय ‘रूस-भारत संवाद’ के नजरिए से मिलती हो।
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